अक्सर हम गायकों को गीत गाते हुए सुनते हैं|मुझे एक बार ख्याल आया की शायद कभी ऐसा भी होता होगा कि गीत तो दर्द भरा हो,पर गायक उसे हलके-फुल्के अंदाज़ में गाए जा रहा हो|जबकि उसे संजीदगी से वह गीत गाना चाहिए था|बस बन गई कुछ पंक्तियाँ :-
संजीदगी से गाओ ये गीत दर्द का है।
ऐसे न मुस्कुराओ ये गीत दर्द का है।
शायर का दर्द तेरी आवाज़ में भी उभरे,
ऐसी कशिश से गाओ ये गीत दर्द का है।
गुजरा है ये तुम्हीं पर ऐसा लगे सभी को,
आँखों में अश्क लाओ ये गीत दर्द का है।
जितने भी सुन रहे हों उस गम में डूब जायें,
कुछ यूँ समां बनाओ ये गीत दर्द का है।
जब लिख रहा था इसको रोया बहुत था दिल ये,
वो दर्द फिर जगाओ ये गीत दर्द का है।
वो सच्ची शायरी है दिल पर असर करे जो,
दिल में ‘अनघ’ समाओ ये गीत दर्द का है।
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