दर्द से मेरे बेख़बर निकला।
जिससे उम्मीद पाल ली मैंने,
क्यों वही शख्स छोड़कर निकला।
वक्त ने भी दिया दगा मुझको,
प्यार का वक्त मुख्तसर निकला।
लूटने वाला हमसफ़र निकला।
***** पुराने ब्लॉगों, पत्रिकाओं, अख़बारों में प्रकाशित एवं कुछ नई गज़लें *****
पर हैं लेकिन कटे हुए हैं।
इक हैं लेकिन बंटे हुए हैं।
अच्छे-अच्छे कहीं नहीं हैं,
गुण्डे आगे डटे हुए हैं ।
आवेदन नौकरी की मत दो,
जिनका होगा छंटे हुए हैं।
वह लड़की है नहीं है लड़का,
जिसके गेसू कटे हुए है।
तन ढकना है जहाँ जरूरी,
कपड़े उनके हटे हुए हैं।
जो तन ढकना चाह रही हैं,
उनके कपड़े फटे हुए हैं।
उनके अच्छे अंक हैं आते,
जो उत्तर को रटे हुए हैं।
सार्वजनिक उद्यान सभी अब,
बस जोड़ों से पटे हुए हैं।
रिश्ते-नाते ‘अनघ’ नाम के,
इक-दूजे से कटे हुए हैं।
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वक्त ये एक-सा नहीं होता।
वक्त किसका बुरा नहीं होता।
वक्त की बात है नहीं कुछ और,
कोई अच्छा-बुरा नहीं होता।
इस जहाँ में नहीं जगह ऐसी,
दर्द कोई जहाँ नहीं होता।
हों चमन में अगर नहीं काटें,
फूल कोई वहाँ नहीं होता।
पल जो ग़मगीन गर नहीं आते,
वक्त ये खुशनुमा नहीं होता।
प्यार क्या है नहीं समझते सब,
गर कोई बेवफा नहीं होता।
जब कसौटी पे वक्त कसता है,
हर कोई तब खरा नहीं होता।
होता भगवान पर यकीं सबको,
जब कोई आसरा नहीं होता।
हर जगह आप ही तो होते हैं,
ऐ ‘अनघ’ दूसरा नहीं होता।
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कौन जिन्दा है कब तलक जाने!
मुंद ये जायेगी कब पलक जाने!
चार दिन के जमीं पे हैं मेहमां,
फिर बुला लेगा कब फलक जाने!
ज़िन्दगी ज्यों घड़ा है मिट्टी का,
फूट कर कब पड़े छलक जाने!
मौत वो जाम है जिसे पीकर,
सूख जाता है कब हलक जाने!
जो गए ज़िन्दगी से दूर ‘अनघ’,
क्या दिखेगी कभी झलक जाने!
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जब भी मन विचलित होता है।
भावों से सिंचित होता है।
झूठ कहीं पर छिप जाता है,
जब भी सच मुखरित होता है।
कुछ भी अच्छा काम करूँ तो,
क्यों अक्सर बाधित होता है।
बीती बातें याद करूँ जब,
हर छण ज्यूं चित्रित होता है।
सच्चे मन से काम करो तो,
मिलता जो इच्छित होता है।
धारावाहिक अब हैं ऐसे,
कोमल मन दूषित होता है।
कोई अच्छा काम करो तो,
हृदय ‘अनघ’ पुलकित होता है।
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जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ।
मैं तो केवल इतना सोचूँ।
बालिग होकर ये मुश्किल है,
आओ खुद को बच्चा सोचूँ।
सोच रहे हैं सब पैसों की,
लेकिन मैं तो दिल का सोचूँ।
बातों की तलवार चलाए,
कैसे उसको अपना सोचूँ।
ऊपर वाला भी कुछ सोचे,
मैं ही क्योंकर अपना सोचूँ।
जो भी होगा अच्छा होगा,
मैं बस क्या है करना सोचूँ।
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