Copyright@PBChaturvedi प्रसन्नवदन चतुर्वेदी 'अनघ'

गुरुवार, 3 नवंबर 2016

यही अब दोस्तों की दोस्ती है

एक ग़ज़ल ( 'मुफाईलुन मुफाईलुन फऊलुन'  पर आधारित ) प्रस्तुत है...

यही अब दोस्तों की दोस्ती है |

नहीं अब हाल तक पूछा कभी है |


ठहाके मार के हंसना, बिहंसना

नहीं भूला मुझे वो पल अभी है |


उदासी दिख रही चेहरों पे ज्यादा,

कहीं पे खो गई जिन्दादिली है |


बिना बातों के वो बातें बनाना,

उन्ही बातों की अब शायद कमी है |


किसी के पास मंजिल का पता है,

किसी के दिल की दुनिया लुट गयी है |


यही तो ज़िंदगी का फलसफा है,

कहीं खुशियाँ कहीं वीरानगी है |


जिए तो जा रहे हैं ज़िंदगी, पर

ये लगता है कहीं कोई कमी है |


अभी खुशबू नहीं छाई फिजां में,

अँधेरे में अभी तक रौशनी है |


बुरा मत बोलना, सुनना, न कहना

किसी ने खूब ये बातें कही है |


‘अनघ’ आता नहीं आनन्द तब भी,

बहुत आराम में गर ज़िंदगी है |  
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सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

ये भला क्यों कभी नहीं होता

एक ग़ज़ल [ "फाइलातुन मुफ़ाइलुन फेलुन" पर आधारित ] प्रस्तुत कर रहा हूँ | आशा है आप अवश्य पसंद करेंगे....
ये भला क्यों कभी नहीं होता |
हर कोई आदमी नहीं होता |

कुछ गलत लोग भी तो होते हैं,
हर कोई तो सही नहीं होता |

जो न सोचा वो बात होती है,
जो भी सोचा वही नहीं होता |

दिल को भी देख लो जरा उसके,
सिर्फ चेहरा हसीं नहीं होता |

क्यों गलत बात को सही कह दें,
हमसे तो बस यही नहीं होता |

कुछ न कुछ तो 'अनघ' कमी सबमें,
क्यों कोई भी धनी नहीं होता |
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बुधवार, 18 नवंबर 2015

आप कहते हैं हमसे ग़ज़ल छेड़िए


मैंने यह रचना ऐसे समय के लिए लिखा है जब गायक से किसी ग़ज़ल की फ़रमाइश हो रही है किन्तु वह दुखी है......उसके मन की व्यथा इस रचना में आप यहाँ पढ़िए और YOUTUBE पर सुनिए.....


आप कहते हैं हमसे ग़ज़ल छेड़िए, कब तलक हम ग़ज़ल यूं सुनाते रहें |
अपने खोए हुए यार की याद से, कब तलक गम की शम्मा जलाते रहें |

ज़िंदगी ने हसीं हमको धोखा दिया,
पहले हमको मुहब्बत का मौका दिया,
फिर जुदाई की तनहाइयां आ गयीं, जिनको हम महफ़िलों में छुपाते रहे......

मेरे दिल में है गम चेहरे पे हँसी,
आप समझेंगे क्या मेरी ये बेबसी,
आप समझेंगे इसको भी मेरी अदा, गाते-गाते जो हम मुस्कुराते रहे.....

हर्फ़ अश्कों के हैं सुर मेरी आह के,
आप कैसे सुनेंगे इन्हें चाह से,
रो पड़ा गाते-गाते आप क्या जाने क्यों, आप तो तालियाँ बस बजाते रहे.....
 
 
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गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015

ज़िन्दगी जीना बहुत दुश्वार है

ज़िन्दगी जीना बहुत दुश्वार है |
जिसको देखो हाथ में तलवार है |

लूटकर वो पूछने आये हैं हाल,
दोस्तों का अब यही व्यवहार है |
 
देवता लगता है कोई आदमी,
कोई तो शैतान का अवतार है |
 
ज़िन्दगी चलती रही तो ज़िंदगी,
रुक गयी तो मौत की दीवार है |
 
बेटियाँ लाठी बने जब बाप की,
तब सुरक्षित जानिए संसार है |
 
सारी दुनिया ये मिसाइल दागती,
प्यार हिंदुस्तान का हथियार है |
      

( काव्योदय के फ़िलबदीह 140 से हासिल )
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आप सभी को दशहरा की शुभकामनाएं....

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2015

जा रहा है जिधर बेखबर आदमी

मैं प्रस्तुत रचना का संपादित प्रारूप प्रस्तुत कर रहा हूँ | आशा है इसका नया प्रस्तुतिकरण आपको पसंद आयेगा......
आप से अनुरोध है कि आप मेरे Youtube के Channel पर भी Subscribe और Like करने का कष्ट करें ताकि आप मेरी ऐसी रचनाएं पुन: देख और सुन सकें |

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रविवार, 26 अक्टूबर 2014

आंधियाँ भी चले और दिया भी जले

मित्रों ! एक रचना अपनी आवाज़ में  प्रस्तुत कर रहा हूँ, आशा है आप को अवश्य पसंद आयेगी...
इस रचना का वास्तविक आनंद Youtube पर सुन कर ही आयेगा, इसलिए आपसे अनुरोध है कि आप मेरी मेहनत को सफल बनाएं और वहां इसे जरूर सुनें...



आंधियाँ भी चले और दिया भी जले ।
होगा कैसे भला आसमां के तले ।

अब भरोसा करें भी तो किस पर करें,
अब तो अपना ही साया हमें ही छले ।

दिन में आदर्श की बात हमसे करे,
वो बने भेड़िया ख़ुद जंहा दिन ढले ।

आवरण सा चढ़ा है सभी पर कोई,
और भीतर से सारे हुए खोखले ।

ज़िन्दगी की खुशी बांटने से बढ़े ,
तो सभी के दिलों में हैं क्यों फासले ।

कुछ बुरा कुछ भला है सभी को मिला ,
दूसरे की कोई बात फ़िर क्यों खले ।
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कृपया आप यहाँ अवश्य पधारें :-

श्री रामदरश मिश्र जी की एक कविता/कंचनलता चतुर्वेदी

रविवार, 10 अगस्त 2014

जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ

मित्रों ! एक पूर्वप्रकाशित रचना अपनी आवाज में प्रस्तुत कर रहा हूँ , इस रचना का संगीत-संयोजन और चित्र-संयोजन भी मैंने किया है | आप से अनुरोध है कि आप मेरे Youtube के Channel पर भी Subscribe और Like करने का कष्ट करें ताकि आप मेरी ऐसी रचनाएं पुन: देख और सुन सकें | आशा ही नहीं वरन पूर्ण विश्वास है कि आप इस रचना को अवश्य पसंद करेंगे |
इस रचना का वास्तविक आनंद Youtube पर सुन कर ही आयेगा, इसलिए आपसे अनुरोध है कि आप मेरी मेहनत को सफल बनाएं और वहां इसे जरूर सुनें...
जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ।
मैं तो केवल इतना सोचूँ।

बालिग होकर ये मुश्किल है,
आओ खुद को बच्चा सोचूँ।

सोच रहे हैं सब पैसों की,
लेकिन मैं तो दिल का सोचूँ।

बातों की तलवार चलाए,
कैसे उसको अपना सोचूँ।

ऊपर वाला भी कुछ सोचे,
मैं ही क्योंकर अपना सोचूँ।

जो भी होगा अच्छा होगा,
मैं बस क्या है करना सोचूँ।
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