Copyright@PBChaturvedi प्रसन्नवदन चतुर्वेदी 'अनघ'

सोमवार, 13 अप्रैल 2020

ग़ज़ल : कितने झंझावात सहे हैं


कोरोना काल में हुई परिस्थितियों पर यह रचना प्रस्तुत है.....

कितने झंझावात सहे हैं, हम ये दुःख भी सह लेंगे |
दर-दर भटका करते थे हम, अपने घर में रह लेंगे|

अरसे बाद मिली है फुरसत, हर अपने से मिलने की,
कुछ सुन लेंगे उनकी हम कुछ अपने दिल की कह लेंगे |

यन्त्रों का युग है जीवन भी हम यन्त्रों-सा जीते हैं,
मानव-जीवन की सरिता ये, इसमें कुछ दिन बह लेंगे |

चिंता इसकी, उसकी, सबकी, अक्सर करते रहते थे,
कब सोचा था बिन चिंता के, हम सब कुछ दिन रह लेंगे |

नदियों की कल-कल मीठी है, आज हवा भी महकी-सी,
मन की सन्दूकों में ऐसी, यादें कर रख तह लेंगे |

ना खोना है ना पाना कुछ, ऐसे पल कब मिलते हैं,
औरों को तो देख चुके हैं, खुद को कुछ दिन गह लेंगे |

Copyright@PBChaturvedi प्रसन्न वदन चतुर्वेदी

बुधवार, 7 जून 2017

अम्मा चली गयीं मेरे पापा चले गए

लगभग एक साल के अंतराल पर मैंने अपने माता-पिता दोनों को (24-3-2016 को माँ और 24-5-2017 को पिता को) खो दिया है।  प्रस्तुत है इस समय मेरे मन की भावना (अभी मैंने कोई मात्रा या बहर नही देखा है, वो बाद में देखूँगा) ...
अम्मा चली गयीं मेरे पापा चले गए।
दुनिया में मुझको छोड़ अकेला चले गए।
 
बचपन के लाड़-प्यार वो दुलार अब कहाँ,
देकर वो मुझको दौर सुनहरा चले गए।
 
वो जब तलक थे दिल से मैं बच्चा ही था अभी,
लेकर ज्यूँ मेरे दिल का वो बच्चा चले गए।
 
होती है अहमियत किसी की जाने के बाद ही,
अहसास हो रहा है जब वो सहसा चले गए।
 
अब भी यकीं नही मुझे क्यों हो रहा है ये,
कल तक तो साथ-साथ थे, यूँ कहाँ चले गए।
 
उनकी कमी खलेगी अब ताउम्र ही मुझे, 
अरमान उनके पूरे हों, वो जहाँ चले गए।

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गुरुवार, 3 नवंबर 2016

यही अब दोस्तों की दोस्ती है

एक ग़ज़ल ( 'मुफाईलुन मुफाईलुन फऊलुन'  पर आधारित ) प्रस्तुत है...

यही अब दोस्तों की दोस्ती है |

नहीं अब हाल तक पूछा कभी है |


ठहाके मार के हंसना, बिहंसना

नहीं भूला मुझे वो पल अभी है |


उदासी दिख रही चेहरों पे ज्यादा,

कहीं पे खो गई जिन्दादिली है |


बिना बातों के वो बातें बनाना,

उन्ही बातों की अब शायद कमी है |


किसी के पास मंजिल का पता है,

किसी के दिल की दुनिया लुट गयी है |


यही तो ज़िंदगी का फलसफा है,

कहीं खुशियाँ कहीं वीरानगी है |


जिए तो जा रहे हैं ज़िंदगी, पर

ये लगता है कहीं कोई कमी है |


अभी खुशबू नहीं छाई फिजां में,

अँधेरे में अभी तक रौशनी है |


बुरा मत बोलना, सुनना, न कहना

किसी ने खूब ये बातें कही है |


‘अनघ’ आता नहीं आनन्द तब भी,

बहुत आराम में गर ज़िंदगी है |  
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सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

ये भला क्यों कभी नहीं होता

एक ग़ज़ल [ "फाइलातुन मुफ़ाइलुन फेलुन" पर आधारित ] प्रस्तुत कर रहा हूँ | आशा है आप अवश्य पसंद करेंगे....
ये भला क्यों कभी नहीं होता |
हर कोई आदमी नहीं होता |

कुछ गलत लोग भी तो होते हैं,
हर कोई तो सही नहीं होता |

जो न सोचा वो बात होती है,
जो भी सोचा वही नहीं होता |

दिल को भी देख लो जरा उसके,
सिर्फ चेहरा हसीं नहीं होता |

क्यों गलत बात को सही कह दें,
हमसे तो बस यही नहीं होता |

कुछ न कुछ तो 'अनघ' कमी सबमें,
क्यों कोई भी धनी नहीं होता |
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