Copyright@PBChaturvedi प्रसन्नवदन चतुर्वेदी 'अनघ'

मंगलवार, 13 मार्च 2012

औरों से तो झूठ कहोगे

 प्रस्तुत है एक आत्मविश्लेषणात्मक ग़ज़ल ( बहर  :-फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन फेलुन फा )  :-

औरों से तो झूठ कहोगे, ख़ुद को क्या समझाओगे।
तनहाई में जब तुम ख़ुद से, अपनी बात चलाओगे।

झूठ, फरेब, दगाबाजी, नफरत, बेइमानी, मक्कारी,
करते हो, छलते हो सबको; पर कबतक छल पाओगे।

कुछ लम्हें ऐसे आते हैं, इन्सां जब पछताता है,
ऐसे लम्हें जब आयेंगे, तुम भी बहुत पछताओगे।

जीने की खातिर दुनिया में, तुम ये करते हो माना,
लेकिन औरों को दुख देकर, क्या सुख से जी पाओगे।

चोट किसी को देते हो खुश होते हो लेकिन सुन लो,
खुश ज्यादा होओगे किसी के, चोट को जब सहलाओगे।

जान बचाने में जो सुख है, कोई कातिल क्या जाने,
तुम ये ‘अनघ’ करके देखो तो, एक नया सुख पाओगे।

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सोमवार, 5 मार्च 2012

ग़ज़ल/सारे बन्धन वो तोड़कर निकला

सभी ब्लागर साथियों को नमस्कार ! बहुत दिन हुए मैनें अपने ब्लाग पर लगातार कुछ नहीं लिखा। लीजिए प्रस्तुत है एक ग़ज़ल (बहर :- फाइलातुन मफाइलुन फेलुन) ....

सारे बन्धन वो तोड़कर निकला।
दर्द से मेरे बेख़बर निकला।

 
जिससे उम्मीद पाल ली मैंने,
क्यों वही शख्स छोड़कर निकला।

 
वक्त ने भी दिया दगा मुझको,
प्यार का वक्त मुख्तसर निकला।

 
ये शिकायत तुम्हारे प्यार से है, 
बेवफ़ाई की राह पर निकला। 
 
मैं लुटा तो मगर ये रंज 'अनघ',
लूटने वाला हमसफ़र निकला
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मंगलवार, 26 जुलाई 2011

पर हैं लेकिन कटे हुए हैं

देर से ही सही लेकिन अपनी उपस्थिति पुनः दर्ज करा रहा हूँ। आशा है आप सभी को ये रचना पसन्द आयेगी.......

पर हैं लेकिन कटे हुए हैं।
इक हैं लेकिन बंटे हुए हैं।


अच्छे-अच्छे कहीं नहीं हैं,
गुण्डे आगे डटे हुए हैं ।


आवेदन नौकरी की मत दो,
जिनका होगा छंटे हुए हैं।


वह लड़की है नहीं है लड़का,
जिसके गेसू कटे हुए है।


तन ढकना है जहाँ जरूरी,
कपड़े उनके हटे हुए हैं।


जो तन ढकना चाह रही हैं,

उनके कपड़े फटे हुए हैं।


उनके अच्छे अंक हैं आते,
जो उत्तर को रटे हुए हैं।


सार्वजनिक उद्यान सभी अब,
बस जोड़ों से पटे हुए हैं।


रिश्ते-नाते ‘अनघ’ नाम के,
इक-दूजे से कटे हुए हैं।

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बुधवार, 1 सितंबर 2010

वक्त ये एक-सा नहीं होता

क्या! आप ने याद मुझे किया! लीजीए मैं आ गया अपनी इस ग़ज़ल के साथ........

वक्त ये एक-सा नहीं होता।
वक्त किसका बुरा नहीं होता।

वक्त की बात है नहीं कुछ और,
कोई अच्छा-बुरा नहीं होता।  

इस जहाँ में नहीं जगह ऐसी,
दर्द कोई जहाँ नहीं होता।

हों चमन में अगर नहीं काटें,
फूल कोई वहाँ नहीं होता।

पल जो ग़मगीन गर नहीं आते,
वक्त ये खुशनुमा नहीं होता।

प्यार क्या है नहीं समझते सब,
गर कोई बेवफा नहीं होता।

जब कसौटी पे वक्त कसता है,
हर कोई तब खरा नहीं होता।

होता भगवान पर यकीं सबको,
जब कोई आसरा नहीं होता।

हर जगह आप ही तो होते हैं,
ऐ ‘अनघ’ दूसरा नहीं होता।

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रविवार, 6 जून 2010

कौन जिन्दा है कब तलक जाने

आज एक अरसे बाद मैं फिर लौटा हूँ ब्लाग की दुनिया में......है ....! जब मैं वाराणसी से बाहर था तो मेरे कार्यक्षेत्र के एक पुराने एडवोकेट और वाराणसी के काव्य-संसार के एक सशक्त हस्ताक्षर श्री रामदासअकेलाजी ( जिनकी गज़लें आप बनारस के कवि और शायर/रामदास अकेला में पढ़ चुके हैं ) ; इस दुनिया को छोड़ गये इसी परिस्थिति में पूर्व की लिखी गयी मुझे अपनी कुछ पंक्तियाँ याद गयीं जो मैं आप से जरूर बांटना चाहूँगा...

कौन जिन्दा है कब तलक जाने!

मुंद ये जायेगी कब पलक जाने!


चार दिन के जमीं पे हैं मेहमां,

फिर बुला लेगा कब फलक जाने!

 

ज़िन्दगी ज्यों घड़ा है मिट्टी का,

फूट कर कब पड़े छलक जाने!

 

मौत वो जाम है जिसे पीकर,

सूख जाता है कब हलक जाने!

 

जो गए ज़िन्दगी से दूर ‘अनघ’,

क्या दिखेगी कभी झलक जाने!

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बुधवार, 17 मार्च 2010

जब भी मन विचलित होता है

जब भी मन विचलित होता है।
भावों से सिंचित होता है।

झूठ कहीं पर छिप जाता है,
जब भी सच मुखरित होता है।

कुछ भी अच्छा काम करूँ तो,
क्यों अक्सर बाधित होता है।

बीती बातें याद करूँ जब,
हर छण ज्यूं चित्रित होता है।

सच्चे मन से काम करो तो,
मिलता जो इच्छित होता है।

धारावाहिक अब हैं ऐसे,
कोमल मन दूषित होता है।

कोई अच्छा काम करो तो,
हृदय ‘अनघ’ पुलकित होता है। 

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